Wednesday, 30 December 2015

अपनी ना-पाक हरकतों से कब बाज आएगा पाकिस्तान

पाकिस्तान हमेशा से भारत-पाक वार्ता रद्द करने का दोष भारत पे लगता रहा और संयुक्त राष्ट्र में यह कह कर किनारा कर लेता की गेंद भारत के पाले में है फिर से दोबारा दोनों देशो के बीच बातचीत अगर शुरू करनी है तो भारत को ही प्रयाश करना होगा तो लो भाई हमारे प्रधान मंत्री ने शुरुआत कर दी है अब पाकिस्तान को भी केवल कश्मीर-कश्मीर का अलाप गाने की बजाये भारत के साथ मिलकर कदम से कदम मिलाना चाहिए और दोनों देशो के बीच बेहतर माहौल बनाने की कोशिश करनी चाहिए तो अब ये माना जाये की अगले साल भारत में होने वाले क्रिकेट विश्वकप में पाकिस्तान की टीम भारत में खेलेगी और बॉर्डर्स पर सिज़फायर का उन्लंघन बंद होगा यदि ऐसा होता है तो दोनों देशो के लिए बहुत अच्छा होगा और यदि नही तो फिर इस गरम मुलाकात का कोई फायदा नही क्यूंकि बात-चित करने का प्रयाश पहले भी किया गया लेकिन पडोसी पीठ पे चुरा भोकने से नही कतराया और न जाने हमारे कितने ही सिपाहि शहीद हुए कितनी माँओ ने अपने बेटे खोये यदि पाकिस्तान रिश्तों में आई नई गर्माहट को दोस्ती में बदल दोनों देशो के लिए तरकी की और देखता है तब तो ठीक है लेकिन यदि वही पुराने मुद्दे लेके बैठता है और उनसे आगे कोई बात करना नही चाहता तो क्या ज़रूरत है दोस्ती का हाथ बढ़ाने की क्यूँ अपमान किया जाये शहादतो की शहादत का इसलिए अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है दोनों देशो का आगामी भविष्य अब पाकिस्तान पे टिका है जैसा की मैंने सोचा था प्रधानमंत्री मोदी के पाकिस्तान दौरे को एक हफ्ता भी नही हुआ और पठानकोट में आतंकवादी हमला हो गया यह कभी नही सुधरने वाले इसलिए रिश्ते सुधरे हुए हो या बिगड़े हुए हालात एक जैसे ही रहते है वार्ता और आंतंकवाद दोनों एक साथ नही चल सकते यदि पाकिस्तान सही भारत से रिश्ते सुधारना चाहता है तो सबसे पहले अपनी पाक-सार जमीन से आंतकवादियो का सफाया करे अन्यथा वह दिन दूर नही जब पाकिस्तान में से शायद इन्सान और इंसानियत दोनों का सफाया हो जाये जैसा इराक और सीरिया में हालिया दिनों में हो रहा है 

Friday, 18 December 2015

पुराने ग्रंथो में छिपा है महिलाओ के प्रति बढ़ते अपराधो को कम करने का राज़

16 दिसंबर 2012 की वह दुखद घटना शायद ही कोई भूल पाया होगा आज उस हादसे के बाद क्या दिल्ली या फिर यु कहे देश के हालात बेहतर हुए है? क्या राजधानी और देश महिलाओ सुरक्षित हो पाए है ? क्या वह बेफिक्र रात में कहीं भी आ जा सकती है यदि आप मेरे से पूछेंगे तो शायद नही कुछ नही बदला है बल्कि उस वारदात के बाद से इस तरह की वारदाते बढती चली गयी चाहे उबेर टैक्सी काण्ड हो या 7 साल की नाबालिग से बदसलूकी कर उसे पार्क में अकेले छोड़ देना इस तरह की वारदाते प्रशाशन की लाचारी को दर्शाती है तीन साल पहले हुए उस हादसे के बाद बड़े-बड़े वादे किये गए थे की दिल्ली और देश दोनों को महिलाओ के लिए सुरक्षित बनाएगे महिलाये बेफिक्र कहीं भी आ-जा सकिंगी लेकिन वह सब वादे केवल इतिहास के पन्नो में धुल बनके रह गए और स्थिति बद से बदतर होती चली गयी महिलाओ के साथ होते अपराध घटने की बजाये उल्टा बढ़ते ही चले गये जिसके कई कारण है केवल प्रशाशन अकेला ही इसके लिए जिम्मेवार नही बल्कि हमारा भी दोष है आप कितने भी सख्त कानून बना ली जिए कितने भी होम गार्ड्स बसों में तैनात कर लीजिये लेकिन यह वारदाते तब तक ख़तम नही होगी जब तक लोगो के मन में व्याप्त संवेदनशीलता दोबारा जाग नही उठती जिसका उदहारण है बलात्कार के बाद बस में उस महिला के साथ की गयी दरिंदगी  जिसका मुख्य कारण यह है की आजकल हम बच्चो के शैक्षिक विकास पे तो ध्यान देते है लेकिन उनके चारित्रिक विकास की और ध्यान देना भूल जाते है जिसकी वजह से आज यह अपराध हो रहे है पता है की जब कुछ साधू संत यह कहते है की स्कूलों में अंग्रेजी किताबो के साथ भगवदगीता या रामायण जैसे ग्रन्थ भी पढाये जाने चाहिए तो शायद मेरी नज़रो में कम से कम  इसमें कुछ गलत तो है नही आप सब की कुछ अलग राये हो सकती है क्यूंकि बच्चो के अच्छे चारित्रिक विकास के लिए उनके सामने मर्यादा पुरषोत्तम राम या भगवन श्रीकृष्ण जैसी प्रेरणा को उनके सामने रखना होगा तभी वह पहले अपने जीवन में कुछ भी बने से पहले एक अच्छा इंसान बने की कोशिश करेंगे आप लोग शायद यह पढ़कर सोचेंगे की तो क्या इसका मतलब हम इतिहास की और भागे या फिर रुढ़िवादी बन जाये नही मैं ऐसा कुछ नही ख रहा हूँ लेकिन कुछ समस्यओं का हल जैसे मनुष्य का अच्छा चारित्रिक विकास इन ग्रंथो के जरिये ही पूरा किया जा सकता है जब हम बच्चो बचपन से ही अच्छी चीजे सिखायेंगे तभी वह अच्छे इंसान बन पाएंगे वो कहते है ना सही देखभाल से ही पौधा पेड़ बनता है ठीक उसी प्रकार ऐसी वारदातों को कम करने के लिए हमे अपने युवाओ की सही शिक्षा देनी होगी और उन्हें महिलाओ के प्रति संवेदनशील बनाना होगा जिसमे शायद यह ग्रन्थ एक अहम् भूमिका निभा सकते है   

Thursday, 3 December 2015

पिच पे होती किच-किच



आज कल भारत में ही नही बल्कि अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट में भी पिचों पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दिया जा रहा है
 यदि कोई टीम हारती है तो वह पिच को जिम्मेदार ठहराती है और यदि जीत ती है तो उसका श्रेय भी खिलाडियों से ज्यादा पिच को दिया जाता है कहते है की पिच में टर्न काफी था इसलिए भारत जीत गया अभी हाल ही में भारतीय टीम ने ज़बरदस्त प्रदर्शन कर टेस्ट श्रृंखला अपने नाम कर ली और दोनों टेस्ट मैच तीन दिन में ही ख़तम हो गये तो सारा ठीकरा पिच पे फोड़ दिया खिलाडियों के साथ-साथ लोग भी आलोचना करने लगे की यह भी कोई टेस्ट मैच है जो तीन दिन में ही ख़तम हो गया और बिना सोचे-समझे पिच को कोसने कहने लगे की इतना ज्यादा टर्निंग ट्रैक तैयार करने की क्या जरुरत थी जिसे मैं बिलकुल भी सही नही मानता ऑस्ट्रेलिया ने भी तो न्यूजीलैंड को तीन दिन में हरा दिया तब क्यूँ नही किसी ने पिच को कोसा ज़ाहिर सी बात है कोई भी होम टीम अपने मन मुताबिक पिच चाहेगी तो इसमें बुराई ही क्या है यदि भारत में स्पिनर्स को ज्यादा एडवांटेज मिलता है यहाँ पिचों से उन्हें अच्छा टर्न मिलता है तो टर्निंग पिचेस तैयार करने में क्या बुराई है क्या जब हमारे खिलाडी बहार खेलने विदेश जाते है तो वहां पे भी तो पहले ही दिन से बॉल स्विंग करना शुरू कर देती है क्या वो हमारे लिए स्पेशल पिच बनवाते है नही ना तो हम भी क्यूँ उनके मन मुताबिक पिच बनवाये क्या इंग्लैंड,ऑस्ट्रेलिया या कहीं भी  भारतीयों के लिए टर्निंग पिचेस बनायीं जाती है नहीं ना तो हम ऐसा क्यूँ करे यदि हमारे टीम को टर्निंग पिचेस पसंद आती है तो टर्निंग ट्रैक्स तैयार करने में कोई गलत बात नही है हर टीम अपने होम एडवांटेज लेना चाहती है तो इसमें किसी को कोई दिक्कत नही होनी चाहिए यदि खिलाडी अच्छा परफॉर्म नही कर रहे है तो उसमे उनका दोष है उनमे कोई कमी है पिच में नही ऐसा तो नही था की सिर्फ भारतीय स्पिनर्स विकेट ले रहे थे अफ्रीकी स्पिनर्स नही वो भी तो विकेट ले रहे थे इस हिसाब से  दोनों ही टीम्स के लिए बराबरी का मौका था लेकिन जो अच्छा खेला वही जीत ता है और वही जीता इसे पहले भारत एकदिवसीय और टी-20 श्रृंखला दोनों हार गयी तो क्या उसमे भी पिच का दोष है खिलाडियों का कोई दोष नही है तो इसलिए सभी आलोचकों से यही कहना चाहूँगा की किसी की हार और जीत का दोष आप अपने खिलाडियों और उनकी परफॉरमेंस को दे ना की पिचेस को