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Tuesday, 4 July 2017

सत्तर सालों बाद होगा दो दोस्तो का मिलन

प्रधानमंत्री मोदी अाज से तीन दिवसिय इजरायल दौरे पर है| भारत अौर इजरायल के संबध यूं तो वैदिक काल से दोनो सभ्यतायो के इतिहास के प्रमाण मिलते है| जब यहुदीयो पर दुनिया भर मे अत्याचार बढा तब केवल भारत ही एकमात्र एेसा देश था जहां उन्हे शरण मिली अौर यहीं से दोनो देशो के लोगो के बीच का रिशता अोर संवाद इतना गहरा हो गया जिसकी मिसाल अाने वाले लंबे समय तक दुनिया के सामने एक ऊदाहरण बनके चमकेगी|इस रिशते मे सबसे बडा योगदान मूलरुप से भारतीय इजरायलि समाज का है| जिसने अपने देश लोटकर वाकई मे उस कहावत को सत्य साबित कर दिया कि भारत कि मिटी सोना उगलती है| जब दुनिया भर मे शरणार्थी यहुदी अपने नये वतन अाये जिसमे भारत से भी लोग मौजूद थे तो उन्हे अपने रंग के कारण भेदभाव का सामना करना पडा जिसका कारण यूरोप से अाये शरणार्थी थे वो रंग मे गोरे थे| जिस वजह से भारतीय मूल के लोगो के मेन शहर से अलग रेगिस्तानी इलाके मे रहने को कहा गया| परंतु अपनी परिश्रम अोर भारतीय संस्कारों के बल पर भारतीय मूल के लोगो ने रेगिस्तानि  इलाके खेती,सब्जीयों कि पैदावार कर कुछ सालों मे उस इलाके को हरे-भरे मैदानों मे बदल दिया| परिणामस्वरुप इनाम के तौर पे अाखिरकार भारतीय मूल के लोगो को भी मुख्य शहरों मे बसने कि अोर समाज के मुख्यधारा से जुडने मे सफलता मिली ओर नये अाधुनिक इजरायल का अपने परिश्रम भारतीय संस्कारो के चलते देश का अभिन्न अंग बन गये| इसी गहरे संबध के चलते इजरायल ने बिना परिणाम कि चिंता करते हुए 1965,1971 भारत-पाक के जंगो मे प्रत्यक्ष ओर अप्रत्यक्ष सदैव भारत कि सहायता कि अोर अंतराष्ट्रीय स्तर पर चाहे स्थिति भारत के अनकूल रही हो या प्रतिकूल सदैव हर मोर्चे पे भारत का पक्ष लिया| वैदिक काल के समय के वजह से दोनो देशों कि सांस्कॄतिक त्योहारो मे भी संमानताये देखने को मिलती उदाहरण के तोर पे दियों के त्योहार यानी दिपावली को दोनो मुल्कों मे अलग-अलग कारणो से मनाया जाता है| एक नही बल्कि एसे अनेक त्योहार है जिनका इतिहास ओर कारण भले ही अलग हो परंतु मनाने का तरीका बिल्कुल समान है| दोनो देशों कि समस्याएं भी एक जैसी हि है फिर चाहे वो अातंकवाद हो या अांतरीक सुरक्षा  महीला सशक्तीकरण ये तमाम वो क्षेत्र है| जहां इजरायल ने महारत हासिल कि है जिनसे भारत बहुत कुछ सीख सकता है|


























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