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Monday, 17 July 2017

बीसीसीअाई ने खेल को खेल नही बल्कि एक धंधा बना के रख दिया है

पिछले कुछ महीनो से कोहली अोर कोच अनिल कुंबले के बीच चली अा रही खींच-तान अाखिरकार थम ही गई| रवि शास्त्री के मुख्य कोच के चयन ने एक बार फिर जाहिर कर दिया कि क्रिकेट मे चयनकर्ताओ से ज्यादा कप्तान कि चलती है| उस कि पसंद ओर नापसंद का ख्याल सर्वोपरी है| वैसे ताजुब कि बात तो यह है कि दुनिया का सबसे अमीर क्रकेट र्बाड होने के बावजूद कप्तान अोर कोच के बीच जो संघर्ष देखने को मिला वो तो शायद ग्रेग चैपल के दौर मे भी नहि मिला साथ ही राहुल द्रविड ओर जहीर खान के चयन से गांगुली अोर शास्त्री के बीच कि जो गहमा-गहमी है वो भी जग जाहिर हो गई वीरेंद्र सहवाग के दौड मे पिछड जाने के बाद दादा ने दिखा दिया कि क्यों उन्हे इस खेल का दादा कहा जाता है| लेकिन दुखद बात यह है कि अनिल कुंबले के इतने सफल कार्यकाल के बाद भी उनको इसतीफे के लिये मजबूर होना पडा जो यह दिखाता है कि किस प्रकार इतने वर्षो मे क्रिकेट का राजनितीकरण हुअा है| क्यो बीसीसीअाई र्कोट अोर लोढा कमेटी कि सिफारिशो को लागु करने मे अब तक नाकाम रहि है| बीसीसीअाई ने खेल को एक धंधा बना दिया है तभी तो खिलडीयों कि इतनी भारी अामदनी के बावजूद भी मैच फिक्सिंग,कैच फिक्सिंग अाईपीएल के फिक्सिंग कान्ड ने ना केवल खेल बल्कि खेलप्रेमियो कि भावनाओ को भी झंकझोर के रख दिया है| इस खेल के प्रति लोगो मे वो भावना नहि रहि जो पहले किसी जमाने मे हु्अा करती थी| तभी अाप लोगो को यह कहते सुनते होंगे कि यह मैच या ये खिलाडी बिक चुका है अोर कइ बार जब सट्टेबाज अोर बुकिज पकडे जाते है तब इन बातो को ओर बल मिलता है| अाज भारतीय क्रिकेट कि यह जो स्थिति है उसका कारण है कि एक खेल के प्रति इतनी जनभावनाये लोगो कि जिसने इस खेल को धर्म कि तरह देखा जाने लगा जिसका सबसे बडा नुकसान हमारे देश को यह हुअा है कि दूसरे खेलो को वो सम्मान प्राप्त नहि हुअा जो कि उन्हे होना चाहिए था यहां तक कि हमारा राष्ट्रिय खेल हाकी मे भारत कितना पिछड गया अथलिट मे तो मिलखा सिंह अोर पीटी उषा के बाद कोइ उस स्तर का धावक नहि मिल पाया जिसका परिणाम हम हर साल ओलंमपिक जैसी प्रतियोगिताओ मे देखने को मिलता है जब देश को यह सुने को मिलता है कि इतनी बडि जनसंखया वाले देश मे खिलाडि पैदा नहि होते लेकिन उन्हे कौन बताए कि क्रिकेट मे भारत जितना पैसा खर्च करता उसका अाधा भी अन्य खेलो मे लगाया होता तो  अाज हमारे देश के खेल का स्तर किसी अौर ही मुकाम पे होता अोर ना ही क्रिकेेट के कारण देश को बद्नामी झेलनी पडती क्योंकि जब सभी खेलो को बराबरी का सम्मान मिलता और बराबर सरकारी सुविधाएं मिलती तो लोग हर खेल को एक सम्मान रवैये से देखते ओर परिणाम यह होता कि केवल क्रिकेट मे ही कयों खेल जगत के हर स्पर्धा मे हिंदोस्तान सफलता कि नई इबादत लिखता जिसका सबसे बडा उदाहरण है अास्ट्रेलिया जिसने विश्व मे सबसे ज्यादा क्रिकेट विश्व कप के खिताब अपने नाम किये है| ओर जभी पांच साल बाद ओलंपिक प्रतियोगिताओ मे टाप पांच देशो मे ही शुमार होता है| जिसका कारण वहां के लोगो का हर खेल के प्रति सम्मान भाव,सम्मान अधिकार ओर युवाओ को अपने पसंदीदा खेलो के प्रति प्रोत्तसाहा्न करना जबकि क्रिकेट मे भी बराबरी का भाव होता तो भी समझ मे अाता जहां एक ओर विराट कोहली कि एक मैच कि अामदनी करोङो मे है वहि अगर अाप इसकी तुलना करे महिला क्रिकेट कप्तान मिताली राज से तो  अाप पाएंगे एक ही खेल के दो अलग वर्गो मे कितना बङा अंतर है पिछले अोलकपिंक्स मे एक के बाद एक जिस तरस से पदक कि दौड से हमारे अथलिटस बाहर हो रहे थे जिस समय भारत कि साख का सवाल था उस समय देश कि बेटियो ने ही देश कि इज्जत बचाई थी पीवी सिन्धु,साक्षी मलिक ये वो नाम है जो अभिनव बिंद्रा,जीतू राय जैसे बडे नामो पे भारी पडी थी ओर अभी चल रहे महिला क्रिकेट विश्व कप मे भारतीय टीम सेमीफाईनल मे पहुंच गई है| जबकि पुरुष ओर महिला वर्ग मे एक ही खेल मे सुविधाओ ओर पैसो का कितना भेद-भाव है| हालांकि पिछले कुछ सालो मे कब्ड्ङी,फुटबाल,जैसे खेलो कि अाईपीएल कि तर्ज पे होने वाली घरेलु लीगो का होना अारंभ हुअा है जिसे काफी सुधार देखने को मिला है जो कि एक सराहनीय प्रयास है लेकिन अभी बहुत सुधार करना बाकि है जिसे भविष्य मे चलके देश मे खेल अोर खिलाडी का स्तर और ऊंचा किया जा सके|
   
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