Saturday, 8 July 2017

दगाबाज है चीन

चीन वैदिक काल मे प्राचीन अखंड भारत एक अंग हु्या करता था| जिसकी सीमाये मध्य एसिया मेसोपोटामिया तक जब एक ही सनातन  सभ्यता पुरे विशव मे थी| चीन के संत भारत नालंदा अोर तक्षिला जैसे महाविद्यालयों मे शिक्षा-दीक्षा लेने अाते थे| लेकिन  जैसे-जैसे समय का चक्र बदला अोर युग बीते वैसे-वैसे परिवर्तन अाया अोर फिर कलियुग मे भगवान विष्णु ने अपने नो वे अवतार सिद्धार्थ गौतम जो अागे चलके भगवान गौतम बुद्ध के नाम से विख्यात हुए अोर यहि से बोद्ध धर्म कि स्थापना हुई| इस्लाम अोर इसाई धर्म के अाने से पूर्व दुनिया भर मे बोद्ध धर्म फैला हुया था|अौर चीन को एक सभ्य देश बनाने मे भगवान गौतम बुद्ध के शिष्य बोद्धिधर्मा का बहुत बडा योगदान था|यह वहि संत है जिनहोने भारत से जाकर चाइना मे शाअोलिन मंदिर कि स्थापना कि अोर साथ ही भगवान गौतम बुद्ध द्वारा कलियुग कि दिव्य युद्ध शिक्षा जिसे सारा संसार अाज शअोलिन कंग-फु के नाम से जानता है| वो भारत के ही एक संत बोद्धिधर्मा ही भारत से चाईना लेके गये थे| लेकिन यहि से धोखेबाज या दगाबाज चाईना कि काहानी शुरु होति है जो शायद देश के पहले प्रधानमंत्री चाचा नेहरु या तो जानते नहि थे या फिर किसी बुद्धीजीवी ने इस बात से अवगत कराना जरुरी नहि समझा जिसका परिणाम भारत ने 1962 के युद्ध मे अपना एक राज्य तिब्बत गवां दिया| लोग अाज कहते है कि चाईना ने 1962 मे धोखे से भारत को हराया था मुह पे हिंदी चीनी भाई-भाई कह के पीठ पीछे छुरा घोंप दिया| लेकिन चीन कि तो फितरत ही यहि रही है| उन्होने संत बोधिधर्मा के साथ भी एक षडयंत्र रचा था जी हां दोस्तो जब भारतीय संत चीन यात्रा से अपने वतन वापस अाना चाहते थे| जब तक वो वहां रहे चीन काफी समॢद्ध अोर विकसित देश बन चुका था| उसे भय था यदी बोद्धिधर्मा यहा से चले गये तो चीन से सुख-समॢद्धी अोर साथ ही साथ शअोलिन कंग-फू कि शिक्षा किसी अोर देशों तक ना पहुंचे इसलिेए एक दिन बोधिधर्मा के खाने मे जहर मिलाके उन्हे परोश दिया गया जिसके चलते उनका स्वर्गवाश हो गया| जो संत भारत के ही नहि बल्कि पूरे चाईना के लोगो के गुरु भी थे जो अपने दुर्लभ विद्या के चलते  विश्वगुरु बने उसी गुरू कि केवल अपने लाभ के लिये निर्मम हत्या कर दि गयी यह घटना कई चाईनीज लेखक अपने लेखो अोर किताबो मे बता चुके है|  लेकिन चीन यह भूल गया कि भारत अनंत काल से सिद्ध संतो,पीरो की भूमि रहा है| लगभग सभी महान संत या पीर भारत मे जन्मे है| या फिर यहां पे अाये है| अोर उनहोने अपना ज्ञान इस धरा के लोगो को दिया है तभी मौजूदा वैज्ञानिक भी मानते है कि भारत कि भूमि सभी धर्मा कि जननी है| ठीक उसी प्रकार  बोद्धिधर्मा ने पहले ही अपन विद्या दक्षिण भारत मे दी थी जिसको अाज हम कलायरीपायटू के नाम से केरल समेत पूरे दक्षिण भारत मे मशहूर है शायद एक सिद्ध संत होने के कारण बोधिधर्मा को इस बात का अाभास था कि उनके खिलाफ कोई साजिश रची जायेगी जिसके चलते उन्होने सर्वप्रथम अपने ज्ञान का प्रसार पहले भारत के लोगो के बीच ही किया इसिलिए अाज भी विदेशों से लोग चीन से पहले वो अनोखी युद्ध शिक्षा सिखने दक्षिण भारत के विद्यालयो मे अाते है| इस कहानी का यहि सार हैकि ज्ञान पे किसी एक का अधिकार नहि वो सबके लिये समान है अौर ना ही उसे किसी वस्तु कि तरह बांध के रखा जा सकता है वो पानी कि धारा कि तरह होेता जो निर्मल बहता रहता है|   अौर अाज चीन सीमा पर भारतीय सेना द्वारा सख्त रवैये अपनाने पर पंचशील समझोता उल्लंघन कि बात कर रहा है| वो शायद भूल गया 1962 के युद्ध कि शुरुअात करके उसी ने बहुत पहले ही उस संधि कि धज्जियां अपने हाथो से उडा दि थी| 
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