कहते है की अगर व्यक्ति कोई भी फैसला लेने से पहले एक बार उस पे विचार करले की भविष्य में उस फैसले से क्या प्रभाव पड़ेगा? तो शायद वो बेहतरी के रास्ते पे अग्रसर हो सकता है| लेकिन यूपीऐ सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जो फैसले लिए है| उन पर यह बात लागू नही होती उल्टा उन्होंने अपने पैर पे कुल्हाड़ी मारने का काम किया है| और इस बात का सही उदाहरण है पठानकोट हमले का असली साजिशकर्ता शाहिद लतीफ़ जिसे यूपीऐ सरकार ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के लिए पिछले कार्यकाल के दौरान रिहा किया था| और साथ ही 25 अन्य आतंकियों को देश की विभिन्न जेलों से रिहा किया गया था| जब इस बात को मैंने पढ़ा तो मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया की किस बीमार मानसिकता वाली सरकार के हाथ में हमने सत्ताह दे रखी थी| जरा मुझे कोई यह बताये की रिश्ते सुधारने का मापदंड अपनाया भी तो क्या आतंकियों की रिहाई जिन्होंने ना जाने कितने निर्दोशो की जान ली है| अगर रिहाई करनी ही थी तो भारतीय जेलों में बंद निर्दोष पाकिस्तानी नागरिक,मछुआरे को रिहा कर देते लेकिन आतंकियों और गुनेह्गारो की रिहाई मेरी समझ के तो परे है लेकिन क्या इसे माहौल बहतर हुआ? जवाब है बिलकुल नही उल्टा उन्होंने हमारी इस दरियादिली का जवाब पठानकोट पे आतंकी हमला करके दे दिया| आप कितनी भी दरियादिली दिखा ले लेकिन बारमबार पडोसी पीठ में छुरा घोपने से नही कतराता साथ ही हम तो उनके नागरिको की रिहाई कर देते है| लेकिन क्या उन्होंने हमारे सरबजीत को रिहा किया क्या उन्होंने पाकिस्तानी जेलों में बंद निर्दोष भारतीय सिपाहियों को रिहा किया जो अभी भी जीवित और भारत में उनके परिवारों को इसकी भनक तक नही है| और हमारी पूर्व सरकारों ने इस प्रकार के फैसले लेकर उन भारतीय सिपाहियों की शहादत का अपमान किया है| जिन्होंने अपनी जान पे खेल के लतीफ़ जैसे अपराधियों को पकड़ा था यह देश की सुरक्षा से समझौता नही तो और क्या है? क्या सरकारे सत्ताह के नशे में इतनी अंधी हो चुकी है की उन्हें सही और गलत का फर्क समझ में नही आ रहा और यूपीऐ के इस फैसले से भारतीय सेना की उस बात को भी बल मिलता है की पिछले कार्यकाल में सेना दवाब महसूस करती थी| समझौता करना ही है तो मापदंड वो रखिये जिसमे देश की सुरक्षा के साथ समझौता ना हो बल्कि देश की सुरक्षा के लिए सझौते हो|
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